विद्यार्थियों में सृजनशीलता को प्रोत्साहित करने हेतु शिक्षक को निम्न तकनीक अपनाना चाहिए-
(1)मस्तिष्क उद्वेलन विधि (Brain Storming Method)-यह विधि 1963 में आसबार्न द्वारा दी गई। इस विधि को उपयोग करके सृजनात्मक विचारों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इस विधि में अध्यापक या परामर्शदाता छोटे-छोटे समूहों में कार्य करते हैं। प्रत्येक समूह के समक्ष एक समस्या रखी जाती है। उसके बाद सभी छात्रों को उसके समाधान के लिए अधिक- से- अधिक विचार व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया जाता है। सभी विचारों का स्वागत किया जाता है। किसी भी विचार को महत्वहीन या अटपटा समझ कर उसकी आलोचना की किसी को भी स्वतंत्रता नहीं होती है। एक व्यक्ति या शिक्षक सभी प्रकट विचारों को शीघ्रता से लिखता जाता है । अंत में सभी विचारों पर एक- एक कर स्वतंत्रता व सम्मान पूर्वक विचार विमर्श किया जाता है । इस प्रकार अंत में समस्या हेतु सर्वाधिक उपयुक्त समाधान को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक विद्यार्थी को अधिक से अधिक विचार रखने का मौका मिलता है। इस विधि के प्रयोग द्वारा सृजनात्मक बालकों की पहचान में भी मदद मिलती है।
मस्तिष्क उद्वेलन विधि के नियम- (1) सर्वप्रथम सत्र आरंभ करने से पहले समूह के सम्मुख समस्या का कथन बतलाया और समझाया जाता है। ( 2) सभी विद्यार्थियों को नए एवं मौलिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। अधिक -से -अधिक विचार प्रस्तुत करने , स्वयं या दूसरो के विचारों को संशोधित व प्रोत्साहित करने को भी कहा जाता है।
(3) सभी विचारों की प्रशंसा की जाती है तथा उन्हें सहर्ष स्वीकार किया जाता है।
(4) किसी भी विचार की आलोचना की छूट किसी को नहीं होती है। क्योंकि आलोचना से विचारों की अभिव्यक्ति में बाधा होती है । (5) अभिव्यक्त सभी विचारों को लिखा जाता है।(6) सभी सदस्यों पर अधिक- से- अधिक विचार व्यक्त करने का उत्तरदायित्व होता है। (7) अंत में सभी विचारों पर एक- एक कर विचार -विमर्श किया जाता है। यह विचार -विमर्श भी स्वतंत्रता व मित्रता युक्त होता है।
अंत में सर्वसम्मति से समस्या का सर्वाधिक उचित समाधान स्वीकार कर लिया जाता है । इस प्रकार यह तकनीक का उपयोग कर विद्यार्थियों में कल्पनाशीलता, समस्या समाधान सोच का विकास, नए विचारों का विकास और सृजनशीलता के विकास कर सकते हैं। इसी तकनीक से विद्यार्थियों को अभिव्यक्ति कौशल भी सिखाया जा सकता है।
(2) समस्या समाधान विधि:-
समस्या समाधान विधि का उद्देश्य ज्ञान को समस्या के माध्यम से देना है। इसमें विद्यार्थी समाधान करके अप्रत्यक्ष रूप से ज्ञान अर्जित करते हैं। इस प्रकार स्वयं अनुभव द्वारा प्राप्त ज्ञान उपयोगी, सार्थक व वास्तविक होता है। सभी विद्यार्थी समस्या से संबंधित आंकड़े संकलित करते हैं। आंकड़े संकलित करने में शिक्षक भी मदद करते हैं। आंकड़ों से प्राप्त सभी समाधान पर विचार- विमर्श कर अंतिम निष्कर्ष निकाला जाता है। इसमें विद्यार्थी स्वयं समस्या का समाधान करना सीखते हैं। यह तकनीक छात्रों के बौद्धिक, सामाजिक गुणों के विकास में अत्यंत उपयोगी है। इसलिए समस्या समाधान तकनीक में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-
(1) समस्या वास्तविक और रोचक होनी चाहिए।
(2) विद्यार्थियों की आयु, शारीरिक, मानसिक क्षमताओं के अनुरूप होनी चाहिए।
( 3) समस्या छात्रों के पूर्व ज्ञान से संबंधित होनी चाहिए।
(4) समस्या स्पष्ट, निश्चित और समाधान योग्य होनी चाहिए।
(5) समस्या पाठ्यक्रम के अनुकूल , शैक्षिक महत्व की समस्या होनी चाहिए।
(6) समस्या ऐसी हो जिसमें छात्रों का ज्ञानवर्धन हो और उन्हें सीखने के अवसर मिले।
(3) सामूहिक चर्चा:-
सामूहिक चर्चा द्वारा भी सृजनात्मकता का विकास किया जा सकता है। सामूहिक चर्चा अनेक प्रकार से की जा सकती है। जैसे- गोलमेज चर्चा, अनौपचारिक चर्चा, औपचारिक चर्चा, विचार गोष्ठी इत्यादि। सामूहिक चर्चा में किसी भी एक समस्या पर चर्चा की जा सकती है ।चर्चा द्वारा निष्कर्ष निकाले जा सकता हैं। चर्चा का लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। सभी को अधिकतम प्रश्न पूछने, विचार व्यक्त करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। सामूहिक चर्चा द्वारा छात्रों को मौखिक अभिव्यक्ति का अवसर प्राप्त होता है। जिससे सृजनात्मकता के साथ-साथ आत्मविश्वास,पहल करने की शक्ति, सहयोग पूर्ण रवैया इत्यादि क्षमता का विकास होता है।
(4) खेल विधि:-
खेल छात्रों की एक स्वाभाविक क्रिया है। खेलों के माध्यम से रोचक व मनोरंजनपूर्ण तरीकों से छात्रों को अनेक बातें भी सीखाई जा सकती है । आत्म अभिव्यक्ति, स्वतंत्रता, प्रसन्नता, सहयोग, आत्म संयम ,कठिन परिस्थितियों में आत्म नियंत्रण, सहनशीलता इत्यादि क्षमताओं का विकास कर सृजनात्मकता को बढ़ाने में सहायक होता है। इसलिए विद्यालयों में सामान्य खेलों की व्यवस्था होती है। इसमें बालकों को भाग लेने हेतु प्रेरित करना चाहिए। कुछ विशेष खेल विधियां जैसे - किडरगार्टन , मांटेसरी द्वारा बच्चों को उपकरण की सहायता से स्वयं करके क्रियाओं द्वारा सीखने की छूट होती है। जिसमें सृजनात्मकता को बल मिलता है।
(4) सिनेटिक्स विधि:-
यह विलियम गार्डन द्वारा विकसित की गई है । इस विधि का प्रयोग मुख्यत: जटिल यांत्रिक समस्याओं का हल पाने के लिए किया जाता है। इसमें भी समस्याओं का वैकल्पिक समाधान ढूंढा जाता है। इसमें बहुआयामी चिंतन का विकास होता है। उदाहरण- चम्मच का सामान्य उपयोग खाना खाने में किया जाता है जबकि चम्मच का अन्य उपयोग ढक्कन खोलने में भी किया जा सकता है। इस प्रकार वस्तु की विशेषता को बढ़ा दिया जाता है ।
अतः सृजनात्मकता का क्षेत्र व्यापक होता है। यह आनुवांशिकता से प्राप्त गुण होता है लेकिन स्वतंत्र प्रशिक्षण और तकनीक अपनाकर इसे विकसित भी किया जा सकता है।
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MLA (9th): साह, मुकेश कुमार. “सृजनात्मकता को प्रोत्साहित करने हेतु विशेष तकनीक (विधियां).” सृजनात्मकता, 4 Mar. 2022, creativitymgahv.blogspot.com/2022/03/blog-post_4.html.
APA: Shah, M. K. (2022, March 4). सृजनात्मकता को प्रोत्साहित करने हेतु विशेष तकनीक (विधियां). सृजनात्मकता. https://creativitymgahv.blogspot.com/2022/03/blog-post_4.html


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