शिक्षणशास्त्र में 'सृजनात्मकता' का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक ऐसा शीर्षक है जिसके उपलब्धि की कोई निश्चित सीमा नहीं है। इसके अंतर्गत एक शिक्षार्थी रचनात्मकता के विभिन्न आयामों को विभिन्न परिप्रेक्ष्य से समझ विकसित करता है। यह निम्नलिखित रूप में शिक्षणशास्त्र का एक अत्यावश्यक ईकाई है:-

(1) विद्यार्थियों की समझ:

 'सृजनात्मकता' के अध्ययन से एक छात्र-अध्यापक अपने विद्यार्थियों को समझने के एक नए आयाम से परिचित होता है। इसमें शिक्षार्थी यह सीखता है कि अपने विद्यार्थी किस प्रकार से एक दूसरे से भिन्न एवं मौलिक हैं। साथ ही, विद्यार्थियों के मध्य व्यक्तिगत भिन्नता की पहचान भी आसान हो जाती है। जो कक्षा के दौरान शिक्षक को अपने विद्यार्थियों की सीमाओं और क्षमता की जानकारी हेतु आवश्यक है। अध्यापक को यह जानकारी हो जाती है कि विद्यार्थी कितने भिन्न एवं मौलिक प्रकार के प्रयासों से समस्या को हल कर रहा है अथवा करने का प्रयास कर रहा है। 

(2) विद्यार्थी केंद्रित अध्यापन:

 एक शिक्षार्थी के लिए यह अति महत्वपूर्ण है कि उसे विद्यार्थी केंद्रित शिक्षण व्यवस्था की संरचना का व्यवस्थित सज्ञान हो। 'सृजनात्मकता' विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में एक अवयव की तरह कार्य करता है। यह विद्यार्थियों को अपनी अभिव्यक्ति अपने ढंग से प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करता है। 

(3) गतिविधियां

'सृजनात्मकता' की पहचान या संज्ञान केवल गतिविधि के माध्यम से ही की जा सकती है। भिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक एवं क्षमता के संदर्भ को ध्यान में रखकर तैयार की गयी 'सृजनात्मकता' गतिविधियों के बारे में एक शिक्षार्थी अपने अध्ययन काल के दौरान प्रशिक्षित होता है, जिसे वह अपने शिक्षण या व्यावसायिक काल में क्रियान्वित करता है। 'सृजनात्मकता' में इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि एक शिक्षक कितने रचनात्मक तरीके से अपनी गतिविधि को प्रस्तुत कर रहा है। 

(4) परीक्षण:

 शाब्दिक तथा अशाब्दिक परीक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों में 'सृजनात्मकता' के सम्बन्ध में धारा-प्रवाहिता, मौलिकता, विस्तारण तथा लचीलापन ज्ञात किया जाता है। धारा-प्रवाहिता में यह देखा जाता है कि एक विद्यार्थी किसी समस्या को हल करने के लिए कितने सम्बंधित एवं प्रासंगिक विचारों को उत्पन्न करता है। मौलिकता में इस बात को ध्यान में रखा जाता है कि विद्यार्थी कितने नवीन विचार उत्पन्न कर किसी समस्या को हल करता है। नए विचारों, भावों कि विस्तृत, व्यापक व गहन प्रस्तुतीकरण करने की क्षमता विस्तरण में आती है। इसमें व्यक्ति नए व ऊंचे विचारों को एक साथ संगठित कर उसका अर्थपूर्ण ढंग से विस्तार करता है, जैसे संक्षिप्त घटना, परिस्थिति को विस्तृत करके प्रस्तुत करने की क्षमता, किसी अपूर्ण चित्र को पूर्ण करने की क्षमता, विस्तारण क्षमता को प्रदर्शित करती है। लचीलापन का तात्पर्य किसी समस्या या परिस्थिति के समाधान के लिए विभिन्न ढंग एवं तरीकों को अपनाने के लिए है। विकल्प एक-दूसरे से इतना भिन्न होंगे, सृजनत्मकता उतनी ही अधिक होगी। 
अतः 'सृजनात्मकता' से सम्बंधित विभिन्न प्रकार के परीक्षणों से शिक्षार्थियों को अवगत कर उससे सम्बंधित उपकरण का निर्माण करना भी सिखाया जाता है।
           
इस प्रकार कह सकते हैं कि शिक्षणशास्त्र में सृजनात्मकता के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण स्थान है।


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MLA(9th): Sah, Mukesh Kumar. “शिक्षणशास्त्र में ‘सृजनात्मकता’ ईकाई का महत्व एवं आवश्यकता.” सृजनात्मकता, 4 Mar. 2022, creativitymgahv.blogspot.com/2022/03/blog-post_51.html.

APA: Sah, M. K. (2022, March 4). शिक्षणशास्त्र में “सृजनात्मकता” ईकाई का महत्व एवं आवश्यकता. सृजनात्मकता. https://creativitymgahv.blogspot.com/2022/03/blog-post_51.html