सृजनात्मकता जैसे की पहले कहा जा चुका है सार्वभौमिक होती है, कुछ विशिष्ट व्यक्तियों वंशजो या कुशाग्र बुद्धि वालों की जागीर नहीं। हम में से प्रत्येक अपनी बाल्यावस्था में कुछ न कुछ मात्रा में सृजनात्मकता के लक्षणों को प्रदर्शित करता है परन्तु आगे चलकर बड़े होने पर इनको भली भांति पोषित और पल्लवित नहीं कर पाता इस कमी को एक अच्छी शिक्षा व्यवस्था और पालन पोषण के उचित तरीकों द्वारा दूर करने का प्रयास किया जा सकता है। दूसरी ओर यह भी सत्य है कि सब बालकों में सृजनात्मकता रूपी चिंगारी और इसे ज्वाला बनाने वाले सहायक तत्व समान रूप से नहीं पाए जाते हैं अतः एक अध्यापक को सृजनकर्ता बालकों की पहचान से संबंधित सभी बातों का पर्याप्त ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि वह समय पर सृजनशील बालकों को सही पहचान कर उनकी सृजनात्मकता के पोषण और विकास में भरपूर सहयोग प्रदान कर सके। 

विद्यार्थियों में सृजनात्मकता उनके वैयक्तिगत भिन्नता को भी प्रदर्शित करता है। यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति नहीं, अपितु एक ऐसी स्थिति है जहाँ प्रत्येक विद्यार्थी का अपना क्षमता होता है। सृजनात्मकता एक प्रकार से विद्यार्थियों में कौशल को प्रदर्शित करती है कि किस प्रकार से कोई विद्यार्थी किसी चुनौती का समाधान करता है। एक शिक्षक के रूप में हमें विद्यार्थियों में यह भाव उत्पन्न करना आवश्यक है कि उनकी सृजनात्मकता विशिष्ट है परंतु यह कोई सहपाठियों के मध्य द्वंद का कारण नहीं बनना चाहिए। अतः इसी आधार पर यह स्पष्ट होता है कि प्रतिभाशाली और सृजनात्मकता में भी कोई पारस्परिक सम्बन्ध नहीं होता है अपितु या इस तथ्य पर निर्भर करता है कि प्रतिभाशालिता को निर्धारित या परीक्षण करने के मानक क्या हैं?

 

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MLA: Gupta, Amit. “विद्यार्थियों में सृजनात्मकता.” सृजनात्मकता, 7 Mar. 2022, creativitymgahv.blogspot.com/2022/03/blog-post_6.html.

APA: Gupta, A. (2022, March 7). विद्यार्थियों में सृजनात्मकता. सृजनात्मकता. https://creativitymgahv.blogspot.com/2022/03/blog-post_6.html