विद्यार्थियों में सृजनात्मकता के अवसर एवं पोषण हेतु एक शिक्षक/शिक्षिका की भूमिका
सृजन शब्द का अर्थ है रचना करना अर्थात छात्रों में ऐसे गुणों एवं कौशल को विकसित करना जिससे बालक स्वयं ज्ञान का निर्माण कर सकें। किलपैट्रिक के अनुसार - "नई विचारों विचारों की खोज में शब्दों या शब्द समूह की रचना व्यवहार में नयापन जो पारंपरिक तरीके से भिन्न हो सृजनात्मकता कहा जाता है।"
किलपैट्रिक के सृजनात्मकता के इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि जब व्यक्ति किसी समस्या या विषय पर लीक से हटकर सोचते हुए समाधान तक पहुंचता है तो वह सृजनात्मकता कहलाती है। एक शिक्षक / शिक्षिका द्वारा बच्चों में सृजनात्मकता को विकसित एवं प्रोत्साहित करने हेतु कुछ तकनीकी हैं -
1) मस्तिष्क उद्वेलन विधि अर्थात ब्रेनस्टॉर्मिंग मेथड - इस विधि में विद्यार्थियों को एक समस्या एक समस्या दी जाती है और विद्यार्थियों को उसके उस समस्या के नवीन समाधान तलाशने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसमें कुछ बालक समाधान तक पहुंचते हैं तो कुछ और आसमान सुझाव भी देते हैं । इस गतिविधि से छात्रों समस्या के हर आयाम को समझने का प्रयास करते हैं।
2) समस्या समाधान विधि- समस्या समाधान विधि विद्यार्थियों में सृजनात्मकता के विकास की एक महत्वपूर्ण विधि है । इस विधि में छात्रों को दैनिक जीवन से जुड़े छोटी-छोटी समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रेरित किया जाता है ताकि छात्र अपने जीवन को सुनियोजित कर सके और स्वावलंबी बन सके।
3) सामूहिक चर्चा - सामूहिक चर्चा में अपसारी चिंतन सृजनात्मकता का आधार है। इसके अंतर्गत समस्या में निहित संबंधों का विश्लेषण, तुलना, मूल्यांकन और निष्कर्ष निकालना सम्मिलित होता है। इससे छात्रों में सहयोग की भावना जागृत होती है तथा वे एक-दूसरे के ज्ञान का प्रयोग कर समाधान तक पहुंचते हैं
4) खेल विधि- खेल विधि बाल को को मनोरंजन के साथ ज्ञान निर्माण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। खेल विधि से तात्पर्य है कि उन सभी विद्यालय कार्यों को खेल में परिवर्तित करना। यह विधि विद्यालय कार्यों में स्वतंत्रता, मनोरंजन और उन्हें स्वयं पूरा करने पर बल देती है।
5) ज्ञान प्रतियोगिता - ज्ञान प्रतियोगिता का उद्देश्य बालों को के अंदर सकारात्मक प्रतियोगिता के भाव को जागृत करना है प्रतियोगिता के प्रभाव से बालक में समस्या समाधान के तरीकों के निर्माण करने के नवीन क्षमताओं को विकास करना है ताकि बालक एक दूसरे से आगे निकलने के क्रम में नए चीजें सीख सकें।
बच्चों में सृजनात्मकता के विकास में करने के लिए योग्य एवं सशक्त शिक्षक की आवश्यकता होती है। हर बालक भिन्न होता है तथा प्रत्येक बालक में सृजनात्मक शक्तियां होती हैं। उन्हें शिक्षक केवल बाहर निकालने में बालक की मदद करता है और उसे दिशा देने का कार्य करता है।विद्यार्थियों में सृजनात्मकता के अवसर एवं पोषण हेतु एक शिक्षक / शिक्षिका की भूमिका निम्नलिखित है :-
1) पाठ पढ़ाते समय बच्चों को सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
2) उनके काल्पनिक विचारों का भी सम्मान करना चाहिए।
3) विचारों की गहराई तक छानबीन करने और कुछ नया खोज निकालने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
4) कक्षा में चर्चाओं के दौरान एनिमेशन ,वीडियो आदि का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए।
5) दूसरे सहपाठियों द्वारा प्रस्तुत विचारों को नए ढंग से समझने के लिए प्रेरित करना चाहिए और उन विचारों में संशोधन को आमंत्रित करना चाहिए।
6) कक्षा में बच्चों के समक्ष एक समस्या प्रस्तुत करें और उसका हल निकालने के लिए उपाय सुलझाने के लिए प्रेरित करें।
7) किसी वस्तु को सुधारने हेतु सुझाव देने के लिए कहें
8) कक्षा में शैक्षिक खेल का आयोजन करना चाहिए।
9) बच्चों को प्रश्न पूछने की आजादी देना चाहिए और अजीबोगरीब प्रश्न को भी स्वीकारना करना चाहिए।
10) कक्षा में वाद- विवाद परिचर्चा आदि का आयोजन करना चाहिए।
11) पुस्तकी ज्ञान को आम जीवन से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।
12) बालकों में कविता ,कहानी, चित्रकारी आदि गतिविधियों में शामिल करना चाहिए।
13) कक्षा का माहौल सुंदर और स्वतंत्र रखना चाहिए ताकि बालक अपने विचारों को निर्भीकता पूर्वक प्रकट कर सकें।
14) अध्यापक को ऐसे प्रश्न पूछने चाहिए जिससे बालक की तर्क क्षमता और जिज्ञासा को बढ़ाया जा सके।
निष्कर्ष
सृजनात्मकता का शिक्षा में विशेष महत्व है । शिक्षा के द्वारा बालको की सृजनात्मक शक्तियों का विकास किया जा सकता है। सृजनात्मक छात्र जीवन के हर क्षेत्र में सफल होते हैं । वे समस्याओं को सुलझाने के लिए नवीन साधन का इस्तेमाल करते हैं। बालकों में सृजनात्मकता का विकास करना शिक्षकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य है परंतु असंभव नहीं है। सृजनात्मकता की बदौलत छात्रों में शोध एवं नवाचार के कौशलों का विकास होता है ।छात्रों की उन्मुक्त विचार कई कठिन समस्याओं के निवारण में कारगर साबित होते हैं। सृजनात्मकता के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान के नए आयामों को समझने में भी मदद मिलती है।
आज के आधुनिक युग में विकसित देश अपने शिक्षण संस्थाओं में सृजनात्मकता पर विशेष बल देते हैं छात्रों को बाल अवस्था से उचित मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है ताकि बालक की सृजनात्मक सोच विकसित हो सके।
जैसा कि कहा जाता है कि 21 वीं सदी भारत की सदी है अतः हमारे शिक्षकों पर यह विशेष दायित्व है कि वह विद्यालय स्तर से ही विद्यार्थियों की सृजनात्मक क्षमता की पहचान कर उसे विकसित करने पर बल दे । भारत की नई शिक्षा नीति में पढ़ाई को रतंट ना बनाकर समझपरक बनाने तथा " कर के सीखने " पर जोर दिया गया । जिससे छात्र अपने बुद्धि एवं कौशलों का वास्तविक जीवन में उपयोग कर सकें। शिक्षा के बहुयामी बदलाव की बदौलत छात्रों का सर्वांगीण विकास होगा ताकि भारतीय छात्र एक वैश्विक नागरिक बन सके और दुनिया में भारत को शीर्ष स्थान पर पहुंचा सके ।
Cite this Post:
MLA(9th): Pandey, Santosh Kumar. “विद्यार्थियों में सृजनात्मकता के अवसर एवं पोषण हेतु एक शिक्षक/शिक्षिका की भूमिका.” सृजनात्मकता, 4 Mar. 2022, creativitymgahv.blogspot.com/2022/03/blog-post_73.html.
APA: Pandey, S. K. (2022, March 4). विद्यार्थियों में सृजनात्मकता के अवसर एवं पोषण हेतु एक शिक्षक/शिक्षिका की भूमिका. सृजनात्मकता. https://creativitymgahv.blogspot.com/2022/03/blog-post_73.html


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